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सूचना  : स० [सं० संचय] संचय करना। एकत्र करना। इकट्ठा करना। अ० एकत्र किया जाना। इकट्ठा होना। अ० [हि० सोचना का अ०] सोचा या विचारा जाना। (क्व०)(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)।
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सूच  : पुं० [सं०] कुश का अंकुर, जो सूई की तरह नुकीला होता है। वि० =शुचि। (डिं०)(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सूचक  : वि० [सं०√सूच् (सूचित करना)+ण्वुल्–अक][स्त्री० सूचिका] सूचना देनेवाला। सूचित करने या बतानेवाला ज्ञापक। बोधक। पुं० १. कपड़ा, चमड़ा आदि सीने की सूई। सूची। २. सिलाई का काम करनेवाला कारीगर। ३. प्राचीन भारत में अभिनय का व्यवस्थापक। सूत्रधार। ४. सिद्ध पुरुष। ५. गौतम बुद्ध का एक नाम। ६. चुगलखोर अथवा दुष्ट और नीच व्यक्ति। ७. आयोग्य माता और क्षत्रिय पिता से उत्पन्न पुत्र। ८. गुप्तचर। जासूस। भेदिया। ९. पिशाच। १॰. कुत्ता। ११. बिल्ली। १२. कौआ। १३. गीदड़। १४. ऊँची दीवार। १५. कटघरा या जँगला। १६. छज्जा या बरामदा। १७. सोरों नामक धान।
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सूचकांक  : पुं० [सं०] खाद्यान्न, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं का विभिन्न समय का मूल्य बतलानेवाला अंक या लेखा। (सामान्य स्थिति के समय का मूल्य प्रायः १॰॰ मान लिया जाता है। इससे बढ़ते या घटते हुए अंक आपेक्षिक मँहगी यी सस्ती के परिदर्शक होते हैं।)(इन्डेक्स नंबर)
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सूचन  : पुं० [सं०√सूच् (बताना)+ल्युट्–अन] [स्त्री० सूचनी] १. सूचित करने अर्थात बताने या जताने की क्रिया। ज्ञापन। उदा०–जगत का अविरत हृत्कंपन। तुम्हारा ही है भयन सूचन।–पन्त। २. सुगंध पैलाने की क्रिया या भाव।
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सूचना  : स्त्री० [सं० सूच+णिच्+युच्–टाप्] [वि० सूचनीय, भू० कृ० सूचित] १. सूई आदि के छेदने या भेदने की क्रिया या भाव। २. वह बात जो किसी व्यक्ति को किसी विषय का ज्ञान या परिचय कराने के लिए कही यी बतलाई जाय। अवगत कराने या जताने के लिए कही हुई बात। (इन्फ़ार्मेशन) ३. वह बात जो किसी व्यक्ति या जन—समाज को किसी विषय में सूचित या सावधान करने के लिए कही जाय। (नो़टिस) ४. वह कागज या पत्र जिस पर उक्त प्रकार की कोई बात छपी यी लिखी हो। इश्तहार। विज्ञापन। (नोटिस) ५. यह बात जो कोई कार्रवाई करने से पहले संबद्ध व्यक्ति या जन—समूह का पहले से विदित कराने के लिए कही या प्रकाशित की जाय। (नोटिस) ६. दुर्घटना आदि के संबंध में अदालती या और किसी तरह की कार्रवाई करने से पहले या किसी और उपयुक्त अधिकारी से उसका हाल कहना। प्रतिवेदन। (रिपोर्ट) ७. कहीं से आनेवाले माल के साथ या उसके संबंध में आया हुआ विवरण, सूची आदि। बीजक। चलान। (एडवाइस) क्रि० प्र०–देना।–पाना।–भेजना।–मिलना। ८. अभिनय। ९. नजर। दृष्टि। १॰. टोहा या भेद लेना। रहस्य का पता लगाना। ११. हिंसा। स० [सं० सूचन से] अवगत या सूचित करना। जतलाना। बतलाना।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सूचना अधिकारी  : पुं० [सं० ष० त०] किसी राज्य या विभाग अथवा संस्था आदि का वह अधिकारी जो जन—साधारण को मुख्य—मुख्य बातों की सूचना देता रहता हो। (इनफा़र्मेशन आफ़िसर)
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सूचना-पत्र  : पुं० [सं० ष० त०] वह पत्र या विज्ञप्ति जिसके द्वारा कोई बात लोगों को बताई जाय। विज्ञप्ति। इश्तहार। (नोटिस)
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सूचनालय  : पुं० [सं० ष० त०] राज्य या उसके किसी विभाग का वह कार्यालय जहाँ से जन—साधारण को समय—समय पर उपयोगी सूचनाएँ दी जाती हैं। (इनफ़ार्मेशन ब्यूरों)
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सूचनीय  : वि० [सं०√सूच् (बताना)+अनीयर] (बात या विषय) जिसकी सूचना किसी को देना आवश्यक हो अथवा जिसकी सूचना दी जा सकती हो।
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सूचयितव्य  : वि०=सूचनीय।
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सूचा  : स्त्री० [हिं० सूचित] जो होश में हो। सचेत। सावधा। स्त्री० [सं०]=सूचना। वि० [सं० स्वच्छ] १. शुद्ध। साफ। २. जिसमें से किसी ने कुछ खाया या चखा न हो। ‘जूठा’ का विपर्याय।
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सूचि  : पुं० [सं०√सूच्+णिन्] १. निषाद पिता और वैश्या माता से उत्पन्न पुत्र। २. सूप बनानेवाला कारीगर। ३. उपकरण। स्त्री० =सूची। वि० =शुचि (पवित्र)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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सूचिक  : पुं० [सं० सूची+ठन्–इक] १. सूई से काम करनेवाला व्यक्ति। २. दरजी।
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सूचिका  : स्त्री० [सं० सूचि+कन्+टाप्] १. सूत्र। २. हाथी का सूँड़। ३. केतकी। केवड़ा।
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सूचिका—घर  : पुं० [सं० ष० त०] सूँड़ धारण करनेवाला, हाथी।
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सूचिकाभरण  : पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार की औषधि जो सन्निपात, विसूचिका आदि प्राणनाशक रोगों तथा साँप के काटने की अन्तिम औषधि मानी गई है। विशेष–इसका प्रयोग सूई की नोक से मस्तक की त्वचा के अन्दर पहुँचा कर भी किया जाता है। और बहुत छोटी छोटी गोलियों के रूप में खिलाकर भी।
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सूचिका—मुख  : वि० [सं० ब० स०] जिसका मुँह सूई के समान नुकीला हो। पुं० शंख।
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सूचिकार  : पुं० [सं०सूचि√कृ ((करना)+अण्] वह जो सुइयाँ बनाने का काम करता हो।
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सूचित  : भू० कृ० [√सूच् (बताना)+क्त] १. जिसमें सूई आदि से छेद किया गया हो। २. जिसकी ओर इशारा या संकेत किया गया हो। जताया हुआ। ३. सूचना के रूप में कहा या भेजा हुआ। ४. जिसे सूचना दी गई हो।
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सूचिनी  : स्त्री० [सं०√सूच् (कहना)+णिनि—इन्–ङीप्] सूचना देनेवाली स्त्री। स्त्री० १. सूई। २. रात।
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सूचिपत्र  : पुं० [सं० ब० स०] १. एक प्रकार का ऊख। २. चौपतिया नामक साग। ३. दे० ‘सूचीपत्र’।
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सूचिपुष्प  : पुं० [सं० ब० स०] केवड़ी। केतकी।
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सूचिभेद्य  : वि० [सं० तृ० त०] १. जो सूई से छेदा या भेदा जा सकता हो। २. जो इतना घना हो कि उसे छेदने या भेदने के लिए सूई की सहायता की आवश्यक्ता पड़ती हो। जैसे—सूचिभेद्य अन्वकार।
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सूचिरदन  : पुं० [सं० ब० स०] नेवला, जिसके दाँत बहुत नुकीले होते हैं।
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सूचिवदन  : पुं० [सं० ब० स०] १. नेवला। नकुल। २. मच्छर।
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सूचिवान् (वत्)  : वि० [सं० सूचि+मतुपम्=वनुम=दीर्द्य] नुकीला। पुं० गरुण।
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सूचि-शालि  : पुं० [सं० कर्म० स०] सोरों नामक धान।
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सूचि-पत्र  : पुं० [सं० ष० त०] १. सूई में पिरोया जानेवाला धागा। २. सूई—धागा।
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सूची  : स्त्री० [सं०√सिव् (सीना)+चट्–टेरुत्वं–ङीप्] १. कपड़ा सीने की सूई। २. शल्य चिक्तिसा में, सूई के आकार—प्रकार का एक उपकरण जिससे छत सीया जाता था। (सुश्रुत) ३. एक प्रकार की सैनिक व्यूह रचना, जो लम्बी और सुई के आकार की होती थी। ४. किसी प्रकार की चीजों, नामों, बातों आदि का क्रम—बद्ध लेखा या विवरण। अनुक्रमणिका। ५. ऐसा लेखा या विवरण जिसमें बहुत से नाम किसी क्रम में आये हों। तालिका। फेहरिस्त। (लिस्ट) ६. सूचीपत्र। ७. चहारदीवारी आदि में हर दो खंभों के ऊपर आड़ा रखा जानेवाला पत्थर। ८. छन्द्र—शास्त्र में प्रत्यय के अन्तर्गत वह प्रक्रिया जिससे यह जाना जाता है कि कुछ नियत वर्णो या मात्राओं से कितने प्रकार के छन्द या वृत्त बनते या बन सकते हैं और अनके आदि तथा अन्त में कितनी लघु और कितनी गरु मात्राएँ होती हैं। ९. एक प्रकार का नृत्य। १॰. द्रष्टि। नजर। ११. केतकी। केवड़ा। १२. सफेद कुश। १३. कटघरा। जंगला। १४. दरवाजे में लगाने की सिटकनी। १५. मैथुन या संभोग का एक प्रकार। पुं० [सं० सूचिन्] १. गुप्तचर। भेदिया। २. चुगलखोर। पिशुन। ३. दुष्ट और नीच। ४. दे० ‘स्वयंमुक्ति’ (साक्षी)।
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सूचीक  : पुं० [सं० सूची+कन्] मच्छर आदि ऐसे जन्तु जिनके डंक सूई के समान होते हैं।
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सूचीकटाह-न्याय  : पुं० [सं० मध्य० स०] लोक व्यवहार में प्रचलित एक प्रकार का न्याय जिसका प्रयोग ऐसे अवसर पर होता है जहाँ कोई कठिन और बड़ा काम करने से पहले सहज और छोटा काम पूराकर लिया जाता है अथवा करना अभीष्ट होता है।
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सूचिकर्म  : पुं० [सं० ष० त०] सूई का काम। सिलाई। सूईकारी।
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सूचीपत्र  : पुं० [सं० ष० त०] १. वह पत्र जिस पर कोई सूची लिखी या छपी हुई हो। २. विशेषतः वह सूचना—पत्र या पुस्तिका जिसमें किसी संस्था में उपलब्ध सामग्री का विवरण होता है। जैसे–(क) प्रकाशन संस्था या सूची—पत्र। (ख) चित्रशाला का सूची—पत्र। (कैटलाग)
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सूची पद्म  : पुं० [सं० ब० स०] एक प्रकार की सैनिक व्यूह—रचना।
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सूचीपाश  : पुं० [सं०] सूई में होनेवाला भेद।
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सूचीभेद  : वि०=सूचीभेद्य।
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सूचीमुख  : पुं० [सं० ष० त०] १. सूई की नोक या छेद जिसमें धागा पिरोया जाता है। २. हीरा। ३. कुश। ४. पुराणानुसार एक नरक। वि० सूई के मुख के समान नुकीला।
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सूचीवक्त्र  : पुं० [सं० ष० त०] स्कंद का एक अनुचर।
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सूचीवक्त्रा  : स्त्री० [सं० सूची वक्त्र–टाप्] ऐसी योनि जिसका द्वार इतना छोटा हो कि वह पुरिष के संसर्ग के योग्य न हो।
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सूच्छम  : वि०=सूक्ष्म।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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सूच्य  : वि० [सं०] जो सूचित किया जा सकता हो या सूचित किये जाने के योग्य हो। जो जताया जा सकता हो या जताया जाने को हो।। पुं० नाटकों या रूपकों में वे अनुचित, गर्हित, रसहीन और वर्जित बातें जो रंगमंच पर अभिनय के लिए अनुपयुक्त होने के कारण केवल अर्थो पेक्षकों के द्वारा सूचित कर दी जाती है। ससूच्य।
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सूच्यग्र  : पुं० [सं० ष० त०] सूई का अगला भाग। सूई की नोक। वि० १. जिसकी नोक सूई के समान नुकीली हो। २. सूई की नोक के बराबर, अर्थात बहुत ही थोड़ा।
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सूच्याकार  : वि० [सं० सूची+आकार] सूई के आकार का । लंबा और नुकीला।
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सूच्यार्थ  : पुं० [सं० ष० त०] साहित्य में, पद आदि का वह अर्थ जो शब्दों की व्यंजना शक्ति से निकलता या सूचित होता है।
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